गुरुवार, 13 जनवरी 2011


गोमुख नीचे जहाँ मिलती गति

विष्णुप्रयाग, प्रणाम है गंगा ।

कूजित है कलनाद जहाँ

वह कर्णप्रयाग, प्रणाम है गंगा ।

नेह से तू नहलाती धरा जहँ

नन्दप्रयाग, प्रणाम है गंगा ।

रूप जहाँ बहुरुप लगे वह

देवप्रयाग, प्रणाम है गंगा ।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. मां गंगा को समर्पित यह रचना अच्छी लगी।

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  2. नयनाभिराम दृश्य और सुन्दर सुरसरि कविता !

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