रविवार, 27 फ़रवरी 2011

देवमुनी भी न जान सके
सच पूछिये तो यह राज है गंगा ।
धर्म धुरीण धरा पर जो
उनके मुख की यह लाज है गंगा ।
वायु हिलोर भरे जब भूमि पे
लागे वहीं यह साज है गंगा ।
भारत भारत है सच में
यह भारत का सिरताज है गंगा ।
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पाप परात दिखात सदा
बस नाम के लेन से पावनि गंगा ।
भोले भभूत रमा विहँसे
लखि के मन से मनभावनी गंगा ।
रोज करे अभिषेक धरा का
लगे नित ही यह सावनि गंगा ।
हाड़ पड़े जिनके तन के
उनको सुरधाम पठावनि गंगा ।

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